जागतिक पुस्तक दिनानिमित्त वाचा ही गुलजार यांची मस्त कविता

By Admin | Updated: April 23, 2016 14:51 IST2016-04-23T14:51:23+5:302016-04-23T14:51:23+5:30

आज 23 एप्रिल, जागतिक पुस्तक दिन. कम्प्युटरच्या युगामध्ये तरूण पिढी जशी इंटरनेटवर रममाण होतेय, त्याचप्रमाणे ती पुस्तकंही वाचते असं वेगवेगळ्या पुस्तक प्रदर्शनांना होणाऱ्या गर्दीवरून जाणवतं

Read on the occasion of World Book Day. Gulzar's wonderful poem | जागतिक पुस्तक दिनानिमित्त वाचा ही गुलजार यांची मस्त कविता

जागतिक पुस्तक दिनानिमित्त वाचा ही गुलजार यांची मस्त कविता

>आज 23 एप्रिल, जागतिक पुस्तक दिन. कम्प्युटरच्या युगामध्ये तरूण पिढी जशी इंटरनेटवर रममाण होतेय, त्याचप्रमाणे ती पुस्तकंही वाचते असं वेगवेगळ्या पुस्तक प्रदर्शनांना होणाऱ्या गर्दीवरून जाणवतं. पुस्तकांचं विश्व उलगडणारी ही गुलजार यांची कविता या निमित्तानं...
 
किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें इनकी सोहबतों में कटा करती थीं, अब अक्सर
गुज़र जाती हैं ‘कम्प्यूटर’ के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें…
इन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई हैं,
बड़ी हसरत से तकती हैं,
 
जो क़दरें वो सुनाती थीं.
कि जिनके ‘सैल’कभी मरते नहीं थे
वो क़दरें अब नज़र आती नहीं घर में
जो रिश्ते वो सुनती थीं
वह सारे उधरे-उधरे हैं
कोई सफ़्हा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के माने गिर पड़ते हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंडे लगते हैं वो सब अल्फाज़
जिन पर अब कोई माने नहीं उगते
बहुत सी इसतलाहें हैं
जो मिट्टी के सिकूरों की तरह बिखरी पड़ी हैं
गिलासों ने उन्हें मतरूक कर डाला
 
ज़ुबान पर ज़ायका आता था जो सफ़हे पलटने का
अब ऊँगली ‘क्लिक’करने से अब
झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था,कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे,
कभी घुटनों को अपने रिहल की सुरत बना कर
नीम सज़दे में पढ़ा करते थे,छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मांगने,गिरने,उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा ?
वो शायद अब नहीं होंगे !

Web Title: Read on the occasion of World Book Day. Gulzar's wonderful poem